अगर देश में आप के लिए शिक्षा का अधिकार दोबारा स्थापित नहीं किया जाता तो क्या हमें पता चल पाता कि जब स्वतंत्रता के लिए मंगल पांडे जी लड़ रहे थे, तो मातादीन जी भी लड़ रहे थे। जब दयानंद सरस्वती जी आर्य समाज की स्थापना कर रहे थे, तो उनसे पहले ही सत्यशोधक समाज की स्थापना के लिए ज्योतिबा राव फुले जी तत्पर थे। जब तुलसीदास जी अपने ग्रंथ लिख रहे थे जो बड़े-बड़े आश्रमों में पढ़े लिखे थे, वहीं संत कबीर जी, संत रविदास जी अमानवीय अव्यवस्था के स्तंभ को तोड़ने के लिए संघर्षरत थे। जब मोहन दास करमचंद गांधी जी असहयोग आंदोलन कर रहे थे, उस समय बाबा साहब डाॅo भीमराव अंबेडकर जी जाति व्यवस्था की अव्यवस्था को डायनामाइट से उड़ाने की बात कर रहे थे।व्यवस्था परिवर्तन में महान पुरूषों ने क्रांति की प्रति-क्रांति पर आंदोलन छेड़ा। मगर आज हम सब संवैधानिक अधिकार प्राप्त कर भी अपने महापुरुषों और उनकी प्रति-क्रांति के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं और न ही जानने का प्रयास करते हैं। आज दो प्रकार की व्यवस्था काम करती दिखती है। एक राजनीतिक व्यवस्था, जिसमें सब एक समान है क्योंकि सबका वोट चाहिए और दूसरी सामाजिक व्यवस्था। जिसमें असमानता आखिरी पायदान तक छुपी हुई रहती है, क्योंकि बराबरी शायद कुछ लोगों को नापसंद है।

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